
भुवनेश्वर से दिल्ली आ रही राजधानी एक्सप्रेस को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में पांच घंटे तक बंधक बना कर माओवादियों ने केन्द्र सरकार को सीधी चुनौती देने के साथ ही अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। एक तरफ केन्द्र सरकार लगातार माओवादियों यानी नक्सलवादियों को राजनीतिक मुख्य धारा में वापस लाने की कोशिश में जुटी हुई है तो दूसरी ओर माओवादी निरंतर हमले कर केन्द्र सरकार की खिल्ली उड़ा रहे हैं। देश के एक बड़े इलाके में विध्वंसक कार्रवाई करने की उनकी क्षमता लगातार बढ़ रही है। कहीं संचार टावर तो कहीं स्कूल-पंचायत भवन उड़ाए गए। अनेक स्थानों पर नरसंहार भी उन्होंने किए हैं।
गरीबी से मतलब नहीं
पिछले ही दिनों हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में माओवादियों ने अब तक केसबसे बड़े कारनामे में 17 पुलिसवालों को मौत के घाट उतार दिया था। जहां तक उनके जंगलों में और आदिवासियों के बीच रहने का सवाल है तो आदिवासियों की गरीबी और बदहाली से चिंतित होकर वहां नहीं रहते बल्कि अवैध हथियारबंद सेना होने के नाते वे जंगली इलाकों में सामरिक रूप से अपने को ज्यादा सुरक्षित पाते हैं। इसी वजह से वे अपने इलाकों में बुनियादी सुविधाओं के विकास का विरोध करते हैं। झारखंड में पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवार का अपहरण के बाद सिर कलम करने वाले माओवादीबंगाल में लालगढ़ तथा जंगल महाल इलाकों में करीब हर रोज हत्याएं कर रहे हैं। माओवादियों के खतरनाक इरादों का अंदाजा सिर्फ इससे लगाया जा सकता है कि नक्सल प्रभावित राज्यों में अपने जवानों पर हमला होने की आशंका के कारण वायुसेना प्रमुख तक उन पर हमले की केन्द्र सरकार से सार्वजनिक तौर पर इजाजत मांग चुके हैं।
लाल आंदोलन से लेना-देना नहीं
वैचारिक रूप से माओवादियों का लाल आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। वे जनतांत्रिक वामपंथियों को बुर्जुआ कहते हैं और मौका मिलने पर उन्हें मार देने तक से नहीं चूकते। नक्सलियों का मानना है कि समाज से अमीर-गरीब की खाई का नामोनिशान मिटा देने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की नहीं बल्कि माओ के सिद्धांतों की जरूरत है। इसी वजह से वे उन इलाकों में ज्यादा रहना पसंद करते हैं जहां गरीबों की संख्या तुलनात्मक रूप से ज्यादा है। वे स्वयं को गरीबों का रहनुमा बताकर उनका साहूकारों से अधिक शोषण करते हैं। अपने खाने-पीने के इंतजाम के लिए वे आदिवासियों के अनाज इत्यादि तक लूट लेते हैं।
अभी तक पुलिस थानों के साथ ही ठेकेदारों, बड़े अफसरों की हत्या करते आ रहे माओवादियों ने पहली बार देश की एक प्रतिष्ठित ट्रेन पर हमला किया है। रेलगाडिय़ों को पहले भी वे विस्फोटों से उड़ाते रहे हैं लेकिन ट्रेन को अगवा कर लेने की हिम्मत उन्होंने पहली बार की है। हालांकि केन्द्र सरकार कई महीनों से नक्सलियों के साथ सख्ती से निपटने की रणनीति बना रही है। नक्सलियों का राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन पर हमला शायद केन्द्र को जल्द उनको काबू में करने के लिए कार्रवाई करने पर मजबूर कर दे लेकिन यह सच है कि अब अगर केन्द्र ने कार्रवाई नहीं की तो पूर्वोत्तर के साथ ही बिहार, कर्नाटक, आंध्र, छत्तीसगढ़ में वे और बड़े हमले करके अपनी ताकत व प्रभाव में बढ़ोतरी के प्रयास कर सकते हैं।

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