
तीन दशकों से बमबारी के धमाकों और गोलियों की तड़-तड़ के बीच जी रहे अफगानिस्तान में शांति की आशा को फिर पलीता लग गया है। यद्यपि खंडहरों में बदले शहरों और दाने-दाने को तरस रहे सुदूर गांवों के लडऩे-मरने के आदी अफगानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन दुनिया का चैन जरूर छिन जाएगा। अमेरिकी नेतृत्व में नाटो फौजों के बूटों तले रौंदे जा रहे अफगानिस्तान में इस बार शांति को वहां के राष्ट्रपति चुनावों में हुई धंाधली के आरोपों ने पटरी से उतारा है।
कई माह के तीखे विरोध तथा दुबारा चुनाव की तारीख तय हो जाने के बाद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के विरोधी अब्दुल्ला अब्दुल्ला चुनाव मैदान से हट गए और हामिद करजई को ही फिर अफगानिस्तान का राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित कर दिया गया। गौर से देखें तो यही स्थिति अफगानिस्तान में पहले से भंग शांति को आग की लपटों में बदल सकती है बल्कि अमेरिकी फौजों को और कड़े मुकाबले में फंसा सकती है। हामिद करजई लगातार दूसरी बार देश के राष्ट्रपति बने हैं। इस चुनाव में करजई के प्रतिद्वंद्वी व पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला के दूसरे चरण के चुनाव [रन-आफ] से अलग हो जाने के कारण करजई को विजेता घोषित किया गया।
मौजूदा अफगान सरकार को अमेरिकन पिटठू बताने वाला तालिबान चुनावी धांधली के आरोपों के बाद तेजी से घूमे घटनाचक्र का फायदा उठा सकता है। लगभग निरक्षर अफगान जनता को धार्मिक कट्टरता की घुट्टी पिलाकर तालिबान उसे सरकार के विरोध में खड़ा कर सकता है। इसके लिए वह चुनाव मैदान से हटे अब्दुल्ला अब्दुल्ला की सहायता भी ले सकता है जो चुनाव मैदान से हटने की घोषणा करके हामिद करजई के प्रति अपनी कड़वाहट व द्वेष को छुपा नहीं पाए। अगर अब्दुल्ला ने तालिबान समर्थक रुख अपना लिया तो फिर सरकार को सशस्त्र संघर्ष के साथ ही राजनीतिक विरोध का सामना भी करना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो तालिबान को निश्चित तौर पर ताकत मिलेगी। अभी कंदराओं और दूरस्थ गांवों में छुपा तालिबान फिर काबुल की ओर कदम बढ़ा सकता है। तालिबान कुछ मुस्लिम देशों के साथ ही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से अब्दुल्ला अब्दुल्ला के लबादे में छुपकर सरकार को परेशान कर सकता है।

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