क्या कोई यकीन करेगा कि 9/11 के आतंककारी आक्रमण के बाद अमेरिका ने हमले की धमकी देकर पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी अभियान की भ_ी में कूदने के लिए मजबूर किया था। अमेरिका ने धमकी दी थी कि अगर पाकिस्तान आतंकवादियों को अपना साथी चुनेगा तो उसे ऐसी बमबारी के लिए तैयार रहना चाहिए जो उसे पाषाण युग में पहुंचा देगी।
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सैनिक शासक जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपनी किताब (अग्निपथ) में यह रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है कि 12 सितम्बर को जब वे पाकिस्तान स्थित गवर्नर हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे तो तत्कालीन अमेरिकी विदेश मत्री कोलिन पावेल ने उन्हें फोन करके यह धमकी दी थी कि आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। 13 सितम्बर को पाकिस्तानी आईएसआई के डायरेक्टर जनरल को वाशिंगटन में अमेरिकी उपविदेश मंत्री रिचर्ड आर्मितेज ने चेतावनी दी कि पाकिस्तान को न सिर्फ यह तय करना है कि वह अमेरिका के साथ है या कि आतंकवादियों के, बल्कि यदि पाकिस्तान आतंकवादियों को चुनता है तो उसे उस बमबारी के लिए तैयार रहना चाहिए जो उसे पाषाण युग में पहुंचा देगी।

किताब में लिखा है कि अमेरिकी हमले को सह पाने में पाकिस्तानी नाकामी साफ थी। साथ ही आर्थिक हालात भी इस लायक नहीं थे कि महाशक्ति के समक्ष खड़ा हुआ जा सके। इसके अलावा पाकिस्तान के सपनों के इस्लामी बम को भी ऐसे हालात में अमेरिका द्वारा नष्ट कर दिए जाने का खतरा भी मुंह बाएं खड़ा था।
मुशर्रफ ने किताब में लिखा है कि अमेरिकी हमले की धमकी के साथ ही पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी उस वक्त बड़ा मुद्दा थी। भारत अमेरिका को हवाईपट्टी की सुविधा उपलब्ध कराकर महाशक्ति को ललचा रहा था। अगर ऐसा हो जाता तो निश्चित तौर पर भारत कश्मीर की मौजूदा स्थिति को अमेरिकी सहयोग से स्थायी बनाने की कोशिश करता जो पाकिस्तान के लिए जीवन-मरण का प्रश्र है।
मुशर्रफ ने स्वीकार किया है कि एक तरफ अमेरिकी धमकी से पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो गया था तो दूसरी ओर अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने से उसके समक्ष एक सुनहरा भविष्य था। लगभग ढह चुकी अर्थव्यवस्था को फिर से वित्त पोषण के लिए दोनों हाथों से मिलने वाली आर्थिक मदद ऐसा ही प्रलोभन था। इसके अलावा आणविक परीक्षण के बाद अलग-थलग पड़ गए पाकिस्तान को फिर से मुख्यधारा में लौटने का मौका भी इस गठबंधन का साथ देने से मिलने वाला था। मुशर्रफ ने अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने के फैसले को न्यायोचित साबित करने के लिए अन्य तर्क भी दिए हैं लेकिन वे यह खुलासा करने में भी नहीं चूके कि अगर ऐसा नहीं करते तो वाकई पाकिस्तान मिट्टी के ढेर में बदल जाता।

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