
दफन नहीं होने देते तिब्बत पर चीनी कब्जे की दास्तान
तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता दलाई लामा से चीन इतना क्यों चिढ़ता है कि उनसे बात करने वाले दुनिया के ताकतवर से ताकतवर नेता को आंखें दिखाने से नहीं चूकता। इतिहास को दर्पण मानें तो 1950 में चीनी सेना के प्रवेश करने से पहले भारत और चीन के बीच बफर स्टेट का दर्जा प्राप्त तिब्बत सांस्कृतिक रूप से भारत के अधिकनजदीक था। हालांकि उसके चीन से भी संबंध थे लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था भारत के सीमांत प्रदेशों के साथ ज्यादा सहज महसूस करती थी। 1914 में तत्कालीन ब्रिटिश भारत की सरकार ने तिब्बत को लेकर शिमला समझौता किया था इसमें ही मैकमोहन लाइन का उल्लेख था। इसके तहत तत्कालीन ब्रिटिश भारत की सरकार ने तिब्बत की परोक्ष आजादी को मान्यता दी गई लेकिन उस पर चीन के स्वामित्व को माने जाने की शर्त को लेकर चीन नाराज हो गया था और उसकी गणतंत्रीय सरकार ने समझौते पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया था। उसी दौर में चीन हमेशा तिब्बत को मुक्त कराने की बात करता रहता था। लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता था कि तिब्बत को किससे मुक्तकराया जाएगा।
तिब्बत का चेहरा हैं दलाई लामा
चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद अनुयायियों समेत राजनीतिक शरण लेने भारत आए तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने कई वर्ष तक चीनी कब्जे से अपने देश को आजाद कराने की परोक्ष कोशिशें वार्ताओं के माध्यम से कीं। उनके अनुयायियों ने सशस्त्र संघर्ष भी किया लेकिन चीनी जबड़े से तिब्बत को छुड़ा नहीं सके। चीन की मान्यता है कि दलाई लामा तिब्बत का चेहरा बन चुका है और वह जब भी दुनिया के किसी भी देश में जाते हैं तो उनके साथ चीन के प्रांत तिब्बत में चीन की उपस्थिति की परोक्ष अथवा खुली चर्चा अपने आप ही हो जाती है।
सरकोजी-दलाई की मुलाकात से रद्द हुआ था शिखर सम्मेलन
यह सही भी है कि शांति का नोबुल पुरस्कार प्राप्त दलाई लामा वाकई जब भी किसी देश में जाते हैं तो तिब्बत पर चीनी कब्जे की साठ साल पुरानी दास्तान भी साथ-साथ चलती है। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात के दौरान चीनी करतूतों विशेषकर मानवाधिकार हनन की बात जरूर उठती है और इसी के साथ चीन को मानवाधिकारों के सम्मान की सलाह भी मिलती है। कुछ देशों में दलाई को गार्ड ऑफ आनर तक दिया जाता है। राष्ट्र मेहमान का दर्जा प्राप्त करके एक वर्ष में अनेक देशों की दलाई लामा की यात्रा तिब्बत पर चीनी कब्जे की दास्तान को दफन नहीं होने देती। चीन के दलाई लामा से चिढऩे का मूल कारण यही है। तमाम कोशिशों के बावजूद तिब्बत पर कब्जे को अंतर्राष्ट्रीय सहमति का जामा पहनाने में चीनी नाकामी का कारण दलाई लामा ही हैं। विदेशी नेताओं के साथ दलाई लामा की मुलाकातों से चीनी सरकार की नाराजगी का आलम ये है कि उसने फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी से दलाई लामा की मुलाकात के बाद यूरोपीय संघ तथा चीन के बीच होने वाला शिखर सम्मेलन तक रद्द कर दिया था। सरकोजी से दलाई लामा की मुलाकात को चीन सरकार ने तिब्बत पर विदेशी हस्तक्षेप तक बता दिया था।
दलाई काटते हैं चिकोटी
जहां तक भारत पर दलाई लामा को लेकर दबाव डालने का प्रश्र है तो उसके पीछे भी चीन का यह डर काम करता है कि जब तक भारत तिब्बत के लोगों को शरण देना बंद नहीं करेगा तब तक तिब्बत में उसके पैर जम नहीं पाएंगे। चीन का यह डर तिब्बत में भारी तादाद में फौज तैनात करने के बाद भी खत्म नहीं हुआ है। चीन का मानना है कि दलाई लामा विदेशी मीडिया से भेंट में चीन सरकार की परोक्ष आलोचना भी करते हैं। इससे तिब्बत का मुद्दा भी जीवित हो उठता है। हाल ही दलाई लामा ने यह कहकर चीन को चिकोटी काटी थी कि चीन सरकार का रवैया सदैव अल्पसंख्यकों को नियंत्रित करने का रहा है, वह यह तक पता लगाने की कोशिश नहीं करती कि स्थानीय लोगों की अपनी प्राथमिकताएं क्या हैं। दलाई लामा ने मुस्लिम बहुल सिक्यांग प्रांत में हिंसा की आलोचना भी की। दलाई लामा मुताबिक चीन का साम्यवादी प्रशासन बाकी मामलों में वास्तविकताओं के हिसाब से अपने चाल और चरित्र में बदलाव कर लेता है लेकिन अल्पसंख्यकों के संबंध में उनकी नीतियां विफल और अवास्तविक हैं। वे सदैव कैसे सब कुछ बनाए रखा जाए, कैसे सब कुछ नियंत्रित रखा जाए के नजरिए से व्यवहार करते हैं। उन्हें इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि स्थानीय लोग क्या सोचते हैं। पिछले दशक में दलाई लामा ने चीन को यह तक प्रस्ताव दिया था कि चीनी प्रभुसत्ता के तहत तिब्बत को सार्थक स्वायत्तता दे दी जाए। सम्पूर्ण आजादी की अपेक्षा सार्थक स्वायत्तता की दलाई लामा की मांग को भी चीन ने ठुकरा दिया था।

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